शरद पूर्णिमाआज शरद पूर्णिमा के नाम से प्रचलित कार्तिक पूर्णिमा हैं और आज के रात की ऐसी मान्यता हैं कि अमृत की बूंदें कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पे धरती पर न्योछावर होती हैं. परंतु हिन्दू धर्म के अनुसार मान्यता का आधार क्या हैं यह हम आपको बताते हैं. द्वापर युग में हुए महाभारत युद्ध के साक्षी बर्बरीक एक महान योद्धा व घटोत्कच और अहिलावती के पुत्र थे और युद्ध से पूर्व भीम के बेटे घटोत्कच के पराक्रमी पुत्र बर्बरीक ने जिद ठान ली कि महाभारत युद्ध मे जो कमजोर होगा उसकी तरफ से लड़ूंगा परंतु यह बात कृष्ण को पता चली तो वो असहज हो उठे और युद्ध मे पांडवों का साथ देने के उद्देश्य से वो बर्बरीक के समक्ष गए और दान में उसका सिर मांग लिया. बर्बरीक ने सहर्ष अपना सिर दान में दे दिया जिसे कृष्ण ने अमृत की बूंदों से सींच कर अमर कर दिया साथ ही उस कटे सिर की इच्छा पर उसे पहाड़ पर स्थापित कर दिया ताकि वो महाभारत का युद्ध देख सके. युद्ध के पश्चात जब पांडवों में गुमान हुआ कि वही वीर हैं तो आपस में चर्चा हुई कि हममें से अधिक वीरता किसने दिखाई और वीर तय करने हेतु कृष्ण को न्योता गया तो वह भी बोले कि मैं तो सारथी बना था लिहाजा किसी की वीरता देख नही सका पर उन्होंने कहा की बर्बरीक बता सकता हैं क्योंकि उसी ने सारा युद्ध देखा हैं.

सभी बर्बरीक के पास गए और वीरता पर प्रश्न किया तो बर्बरीक ने बताया कि मैने तो युद्ध भूमि में सिर्फ सुदर्शन चक्र को तांडव करते और योद्धाओं को खेत होते देखा. यह सुन पाण्डव काफी शर्मिंदा हो गए और कृष्ण से घमंड पर क्षमा याचना की. तो ऐसी मान्यता हैं की बर्बरीक के इस जवाब के कारण कृष्ण ने इसी दिन बर्बरीक को अमृत से सींचकर अमर किया था और इसीलिए हिन्दू धर्म के लोग आज की रात खीर को खुले आसमान में रखते हैं और यह कामना करते हैं की ईश्वर इस खीर में अमृत की वर्षा कर हमे धन्य करेंगे और फिर कृष्ण ने बर्बरीक की भक्ति को नमन करते हुए उसे अमरता प्रदान की थी इसलिए बर्बरीक को खाटू श्याम के तौर पर भी जाने जाते हैं और उनकी पूजा की जाती हैं.

शरद पूर्णिमा

बर्बरीक, खाटूश्याम और टेसू को एक ही माना जाता हैं और आज ही की रात बुंदेलखंड में टेसू राजा की शादी झेंझी रानी संग कराने की परंपरा भी निभाई जाती हैं और इसी के साथ हिन्दू धर्म मे विवाह के योग भी शुरू होते हैं. शरद पूर्णिमा के दौरान बुंदेली बच्चे ‘टेसू गया टेसन से पानी पिया बेसन से’, ‘नाच मेरी झिंझरिया’ आदि गीतों को गाकर उछलती-कूदती बच्चों की टोली हाथों में पुतला और तेल का दीपक लिए यह टोली घर-घर जाकर चंदे के लिए पैसे मांगती हैं. कोई इन्हें अपने द्वार से पैसे देता हैं तो कहीं बच्चे गाने गाकर लोगों का खूब मनोरंजन करते हैं. चंदे के पैसे को इकठा कर बच्चे टेसू-झेंझी के विवाह को धूमधाम से मनाते हैं वहीं लड़कियां भी अपने मोहल्ले में झेंझी रानी को सजा धजा कर नचाकर बड़े-बुजुर्गों से पैसे इकट्ठे करती हैं. टेसू-झेंझी का यह खेल बच्चों द्वारा नव दुर्गा की नवमी से पूर्णमासी तक नियमित खेला जाता हैं.

इससे पूर्व लगभग १६ दिन तक बालिकाएं गोबर से चांद-तरैयां व सांझी माता बनाकर सांझी खेल खेलती हैं. वहीं नवमी को सुअटा की प्रतिमा बनाकर टेसू-झेंझी के विवाह की तैयारियों में सभी जुट जाते हैं. आज पूर्णमासी की रात को टेसू-झेंझी का विवाह पूरे उत्साह के साथ किया जाता हैं. बच्चे ही नही बल्कि महिलाएं व बड़े-बुजुर्ग भी इस उत्सव में समान रूप से भाग लेते हैं. रीति-रिवाजों के मुताबिक लड़के टेसू राजा की बारात निकालते हैं तो लड़कियां भी झिंझिया/झेंझी रानी को विवाह मंडप में ले आती हैं. इसके बाद ढोलक की थाप पर मंगल गीतों के साथ टेसू-झेंझी का विवाह कराने की परमलर निभाई जाती हैं.

हालांकि हमेशा की तरह सात फेरे पूरे भी नहीं हो पाते और लड़के टेसू का सिर धड़ से अलग कर देते हैं. वहीं झेंझी भी अंत में पति वियोग में मृत्यु को प्राप्त हो जाती हैं. घटोत्कच के पुत्र टेसू राजा के नाक, कान व मुंह आदि कौड़ी के बनाए जाते हैं. जिन्हें लड़कियां रोज सुबह पानी डालकर जगाने का प्रयास करती हैं. विवाह के बाद टेसू का सिर उखाड़ने के बाद लोग इन कौड़ियों को अपने पास रख लेते हैं. अन्यथा टेसू राजा का सिर घर मे ही कहीं सुरक्षित रख लेते और मान्यता के अनुसार इनको घर मे रखने से मन की सभी मुरादें पूरी हो जाती हैं एक प्रकार से कहा जाए तो शरद पूर्णिमा अमरत्व की कामना का पर्व हैं|

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