गलतफहमियों से शुरू हुई दोस्ती को बया करती ‘माही’

‘माही’ सिर्फ एक नाम नहीं इसके पीछे की घटनाओं को रेखांकित कर एक किताब माही… एक अधूरी जिंदगी  में तब्दील कर दिया हैं दिल्ली की रहने वाली नंदनी अग्रवाल ने और महावीर पब्लिशर्स द्वारा प्रकाशित ये किताब जिसमे नंदनी जी की कल्पनाएँ जो एक कथा में रूपांतरित हैं उन कल्पनाओं का संछिप्त अंश, यह कहानी दिल्ली की एक छात्र ‘माही’ की हैं  जो दिल्ली लॉ कॉलेज से अपनी लॉ की पढाई कर रही हैं माही की जिंदगी में सिर्फ उसके बुजुर्ग दादा और दादी हैं और एक अंजान दोस्त आदित्य जिसे माही ने आजतक देखा नहीं हैं इसके बावजूद वो ४ वर्षों से अपनी दोस्ती को निभा रहे हैं आदित्य एसआरएस जयपुर मेडिकल कॉलेज का छात्र है माही और आदित्य विभिन्न क्षेत्रों से ताल्लुक रखने वाले क्षात्र हैं एक कानून तो दूसरा चिकित्सा विभाग से हैं दोनों अलग-अलग जातियों और शहरों से हैं  और उन दोनों का रवैया भी एक दूसरे से बिलकुल जुदा हैं शायद उनकी दोस्ती से ज़्यादा कुछ महत्वपूर्ण नहीं जिसे पन्नों पे बया कर पाना मुश्किल है आदित्य माही के लिए अलग-अलग प्रान्तों की भिन्न-भिन्न भाषाएँ सीखता हैं और उसके जरिए अपना प्रेम भाव प्रकट करना चाहता हैं क्योंकि वो उसे सीधे प्रस्तावित करने से कतराता हैं और जब भी वो ऐसा करता माही उसे समझने में विफल हो जाती आदित्य माही के साथ सभी बातो को साझा किया करता चाहे वो विच्छेदन हॉल की बात हो या आधी रात को टहलना या कॉलेज रैगिंग या फिर भांगड़ की यात्रा वह सभी चीजों की विस्तृत फाइल बनाता और इसे अपने ई-मेल आईडी में सहेजता ताकि माही आदित्य के जीवन की सभी बाते जान सकें और कौन जानता था कि गलतफहमियों से मिलने वाले ये दो क्षात्र एक दिन इतने अच्छे दोस्त बन जाएंगे और एक दूसरे को देखे बिना भी प्यार में पड़ जाते हैं और वे दोनों अपनी भावनाओं को समझते हैं आदित्य हमेशा उसे महसूस करता है कि वह हर पल उसके साथ हैं अपने दो साल की दोस्ती के बाद वे दिल्ली स्थित एम्स के कार्यक्रम में मिलने का फैसला करते हैं पर किसे पता वो वहा मिल भी पाते हैं या नहीं… यहाँ आप विस्तार स्वरुप पढ़े महावीर पब्लिशर्स द्वारा प्रकाशित नंदनी अग्रवाल की किताब (माही… एक अधूरी जिंदगी) और माही-आदित्य मित्रता की गाथाएँ | 

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