दलित संगठन का भारत बंद आंदोलन आज

दलित संगठन का भारत बंद
कुछ दिनों पहले अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के विरोध में दलित और आदिवासी संगठनों ने देशभर में आज दलित संगठन का भारत बंद आह्वान किया हैं.

पंजाब सरकार ने बस और मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित रखने का आदेश दिया हैं जबकि सेना एवं अर्द्धसैनिक बलों को किसी भी परिस्थिति के लिये तैयार रहने के लिये कहा गया हैं. दलित संगठन का भारत बंद के दौरान स्कूल बंद रहेंगे और बसें भी सड़कों पर नहीं चलेंगी. संगठनों की मांग हैं कि अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम १९८९ में संशोधन को वापस लेकर एक्ट को पूर्व की तरह लागू किया जाए. दलित संगठन का भारत बंद के आह्वान को कई दलित नेताओं का समर्थन हासिल हैं.

गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवानी ने भी लोगों से भारत बंद में शामिल होने का आह्वान किया हैं. दलित संगठन का भारत बंद को ले कर पंजाब सरकार के एक प्रवक्ता ने बताया कि सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलाने वालों पर लगाम लगाने के मद्देनजर राज्य में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित रहेंगी. प्रवक्ता ने बताया कि किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिये कल पूरे राज्य में बंद के दौरान सार्वजनिक एवं निजी परिवहन की सेवाएं निलंबित रहेंगी. बैंक भी बंद रहेंगे.

मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के शीर्ष पुलिस अधिकारियों एवं प्रशासनिक अधिकारियों के साथ सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करने के बाद ये आदेश जारी किये गये. इसके बाद एक वीडियो कॉन्फ्रेंस भी आयोजित की गयी जिनमें मुख्य सचिव, उपायुक्त एवं सभी जिलों के अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे. सुरक्षा बलों ने आज एहतियात के तौर पर राज्य के कुछ हिस्सों में फ्लैग मार्च निकाला. सरकार ने तीन अप्रैल तक कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट नियुक्त किया हैं.

मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने राज्य के लोगों खासकर अनुसूचित जाति के सदस्यों से संयम बरतने और कानून व्यवस्था बनाए रखने की अपील की हैं. ‘दलित संगठन का भारत बंद’ में केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में आज एक पुनर्विचार याचिका दायर कर एससी-एसटी के कथित उत्पीड़न को लेकर तुरंत होने वाली गिरफ्तारी और मामले दर्ज किए जाने को प्रतिबंधित करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को चुनौती देगी. दरअसल, इस कानून का लक्ष्य हाशिये पर मौजूद तबके की हिफाजत करना हैं.

आधिकारिक सूत्रों ने बताया हैं कि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा सुप्रीम कोर्ट में आज दायर की जाने वाली पुनर्विचार याचिका में यह कहे जाने की संभावना हैं कि कोर्ट का आदेश अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, १९८९ के प्रावधानों को कमजोर करेगा. सूत्रों ने बताया कि मंत्रालय यह भी कह सकता हैं कि हालिया आदेश से कानून का डर कम होगा और इस कानून का उल्लंघन बढ़ सकता हैं.

गौरतलब हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून के तहत तुरंत होने वाली गिरफ्तारी और आपराधिक मामले दर्ज किए जाने को हाल ही में प्रतिबंधित कर दिया था. यह कानून भेदभाव और अत्याचार के खिलाफ हाशिये पर मौजूद समुदायों की हिफाजत करता हैं. इस मामले को ले कर लोजपा प्रमुख राम विलास पासवान और केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री थावरचंद गहलोत के नेतृत्व में एनडीए के एसएसी और एसटी सांसदों ने इस कानून के प्रावधानों को कमजोर किए जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर चर्चा के लिए पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की थी.

गहलोत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका के लिये हाल ही में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को एक पत्र लिखा था. उन्होंने इस बात का जिक्र किया था कि यह आदेश इस कानून को निष्प्रभावी बना देगा और दलितों एवं आदिवासियों को न्याय मिलने को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करेगा. इस बीच, गहलोत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध कर रहे विभिन्न संगठनों और लेागों से शुक्रवार को अपना प्रदर्शन वापस लेने की अपील की. वहीं राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने फैसले पर पुनर्विचार की मांग करते हुए कहा कि मूल अधिनियम को बहाल किया जाना चाहिए| खबर एबीपी न्यूज़

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