किताब पत्रकारिता के गीत सभी वर्ग के पाठकों हेतु

अभिषेक शर्मा की किताब पत्रकारिता के गीत

पत्रकारिता के गीतदैनिक जागरण के संपादकीय विभाग में कार्यरत अभिषेक शर्मा की किताब ‘पत्रकारिता के गीत’ की चर्चा तबसे हैं जबसे रचना की कड़ियाँ दर कड़ियां जुड़ना शुरू हुई थीं. ‘विस्तार से परिचर्चा फिर कभी…’ के भावों ने कलेवर और तेवर पर कभी बहस का रूप अख्तियार नही किया. फिर भी कई मित्रों  शुभचिंतकों के सवाल पुस्तक और लेखन को लेकर उठे तो अभिषेक शर्मा ने हमारी न्यूज़ एजेंसी के जरिये उन में से कुछ प्रश्नों के जवाब दीये

क्या सोच कर लिखी पत्रकारिता के गीत :– सोचा नही था कि जो पेशेगत भावनाओं को शब्दों में ढाल रहा हूँ वह कभी मुकम्मल किताब बन जाएगी. वह इतिहास ही नही बल्कि एक अनोखा रिकार्ड होगी यह नही मालूम था. हाँ, अच्छा लगता हैं जब प्रयासों को मुकम्मल दस्तावेज का स्वरूप मिलता हैं. विश्व की यह पहली पत्रकारिता पर काव्य संग्रह हैं यह नही मालूम था मगर अब यह पाठकों के हाथ में हैं तो उम्मीद हैं एक पत्रकार क्या सोचता हैं, क्या झेलता हैं का भाव भी लोग समझ सकेंगे.

लिखने की शुरुवात कैसे :– लिखना तब शुरू किया था कविताओं को जब सोशल मीडिया पर पत्रकारिता जैसे पेशे पर आपत्तिजनक पेड पोस्ट होते थे. गाली गलौज और ट्रोल का दौर चलता था, उसी पेशे का मैं भी हिस्सा था तो उन भावों उन संघर्षों और उन विरोधों को जीने का सहूर अपनाता गया और उसे शब्दों की आंच में पकाता गया. पकाना भी क्या, परवरिश कह सकते हैं इस पेशे की जो गाली गलौज से परे मगर सहज सरल और सार्थक शब्दों से गुथे थे. समझिये कि वार को झेलते हुए खुद को जो अनुभूतियां उपजीं उन्हीं को रचता गया और आज मुकम्मल पुस्तक यानि दस्तावेज बन गई.

क्यु सुझा पत्रकारिता के गीत :– एक पत्रकार भला मानुष ही होता हैं, जिसका मकसद जन कल्याण ही होता हैं. जो कहते हैं मीडिया बिकाऊ हैं वो खरीदार चार मेरे सामने खड़े कर दीजिए. कारोबार और पत्रकारिता समानांतर रेल की पटरियां हैं मगर एक दूसरे से अलग हैं. कौन शीर्ष कारोबारी हैं जिसने विज्ञापन दिया और उसके खिलाफ नही लिखा गया? जबकि तीखा लिखने पर विज्ञापन अधिक मिलता हैं, विज्ञापन देने वाला अपराधी जो तो मीडिया संस्थान भी कई बार विज्ञापन लेने से मना कर देते हैं. यह समाज मे चर्चा का विषय नही बनता, उनको यह कौन बताएगा? यही बताने को गीत माला रचनी पड़ी कि जिस  पत्रकार पर आरोप सड़क चलते लगाते हैं उसने भी आदर्शों की मर्यादा आपकी उम्मीदों से आगे की तय कर रखी हैं.

ये किताब सम्पूर्ण पत्रकारिता के लिहाज से कितनी पूर्ण :– सौ गीतों से अधिक का कलेक्शन था मगर चयनित सिर्फ इतने ही किये. क्योंकि इनमें ही पत्रकारिता के सभी भाव समाहित हो गए. प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और वेब सब कुछ इसी में समेटना पड़ा, मसला यह भी कि कविता संग्रह बोर भी करने वाली न हो. खबर लिखने वाला कविता लिखेगा तो भी उसमे जन अभिरुचि का ख्याल रखेगा उसमे भी रीडर कनेक्ट खोज लेगा. शेष तो अब पाठक के हाथों में ‘पत्रकारिता के गीत’ आना शुरू हो चुकी हैं तो बेहतर हैं वही अपना फीड बैक दे कि पत्रकारिता और साहित्य का यह मेल अनोखा या अलहदा हैं तो कितना.

पत्रकारिता का पहला काव्य संग्रह सदियों बाद :– किसी ने अभी तक पत्रकारिता पर काव्य संग्रह क्यों नही रची इसका तो जवाब बीते अतीत में जाकर नही खोजा जा सकता. यह हमारे हाथ मे भी नही कि जो पत्रकार थे या साहित्यकार थे उन्होंने क्यों इससे परहेज रखा. हां समझ सकता हूँ कि पत्रकार को समाज की फिक्र होती हैं तो वह खबर लिखेगा, साहित्य के प्रति रुझान हुआ तो भी वह तकलीफ ही लिखेगा. यह स्वाभाविक हैं और पत्रकारिता का प्रथम आदर्श हैं. मगर पत्रकार भी मानव हैं, वह मानसिक और शारीरिक श्रम दोनों ही समानुभूति भाव से करता हैं. दुनिया का गम देखा तो मैं अपना गम भूल गया का भाव रखने वाला पत्रकार खुद को नही देखता, तकलीफों से उपजे भावों को जब शब्दों का साथ मिला तो पत्रकारिता के गीत ने भी आकार ले लिया.

किताब कौन से पाठक वर्ग के लिए हैं :– पत्रकारिता के गीत का कोई पाठक वर्ग तय नही हैं. यह संग्रह सबके लिए हैं, जो पत्रकार हैं यह उन्ही की किताब हैं. जो पत्रकारिता जैसे पेशे को नही समझते उनकी किताब हैं, वह जो सुबह अखबार का मोह नही छोड़ पाते उनकी किताब हैं, वह जो टीवी की स्क्रीन पर खबरों की जांच पड़ताल करते खुद विश्लेषण पर उतर आते हैं उनकी किताब हैं. किताब पत्रकारिता के गीत अपने विषय का इकलौता काव्य संग्रह हैं तो इसकी तुलना किसी अन्य से करने का कोई अर्थ नही. सबसे बेहतर अर्थ नही इसका निहितार्थ तलाशने की जरूरत हैं कि इन कविताओं ने किन परिस्थितियों में परवरिश पाई. निश्चित ही एक पत्रकार को आप समझ जाएंगे तो आपको भी खुद पर गर्व होगा कि वह अपनी बीपी भला किसके लिए बढ़ाता हैं.

किताब प्रकाशित होने की सूचना के बाद कैसा लगा :– ब्रेकिंग ही हो गई समझिये, बधाइयां मिलना सुखद होता हैं. पहले खबरों के लिए बधाइयां मिलती थीं अब इस शॉकिंग कविता संग्रह पत्रकारिता के गीत के लिए बधाई मिल रही हैं. खबरों से परे खुद खबर का हिस्सा होना थोड़ा असहज भी करता हैं मगर यह सब जीवन का हिस्सा हैं. लोग चौंक भी रहे हैं कि पत्रकारिता जैसे विषय पर काव्य संग्रह? हां मगर यह हो चुका हैं. जो बचा हैं बस उसी को रचा हैं, यह अगर साहित्य जगत ने रचा होता तो मेरे रचने के लिए कुछ भी न बचा होता. किसी से शिकायत नही, परिस्थितियों की देन हैं. कभी देश को आजाद कराने में पत्रकारिता सक्रिय थी तो आज आजादी को अक्षुण्ण बनाये रखने में. थोड़ा सम्बल भी मिलना इस पेशे में संजीवनी के समान हैं तो काव्य संग्रह की सफलता निश्चित ही पूरे पत्रकारिता जगत को निहाल करने वाला साबित होगा.

कविता जो दिल के करीब :– कविताओं के संग्रह में मुझे तो सभी एक समान लगीं हैं. एक पत्रकार के लिए खबर और खबर का असर जितना मायने रखता है उतना ही लेखक के लिए रचना की सार्थकता. सौ कविताओं में सभी के अपने भाव हैं अपनी अभिव्यक्ति हैं अपनी अभिलाषा और अपने उद्देश्य हैं. समानुभूति का भाव रखता हूँ बतौर पत्रकार तो वही कसौटी अपने लिए भी हैं जो दूसरों की समालोचना के समय मन मे होती हैं. उसी कसौटी पर शब्दो को कसना, गूंथना और निथारने की प्रक्रिया से गुजरा हूं तो किसी एक को चयनित करना शेष के साथ अन्याय होगा.

ये थी अभिषेक शर्मा की किताब ‘पत्रकारिता के गीत’ और उनकी चर्चा इस किताब के पहले भी मीडिया पर आधारित एक पुस्तक ‘इंडियन फ्रेम में ई दुनिया’ अभिषेक शर्मा ने लिखी थी जिसमे भारतीय परिस्थितियों में इलेक्ट्रॉनिक दुनिया को रखा था. दूसरी ‘पत्रकारिता के गीत’ अब आपके समक्ष हैं. इसके अलावा लघु प्रेम कथा संग्रह भी पूरी होने जा रही हैं और उम्मीद हैं की जल्द ही युवाओं पर केंद्रित यह पुस्तक भी पढ़ने को मिलेगी. इसके अतिरिक्त भी दो अन्य उपन्यास कतार में हैं.

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