होली चिता भस्म से खेली जाती हैं यहाँ

होली
Photos By Bhairav Jaiswal

मोक्ष की नगरी काशी की होली अन्य जगहों से अलग

आज होली हैं और ये रंग-राग, आनंद-उमंग और प्रेम-हर्षोल्लास का उत्सव हैं. देश के अलग-अलग हिस्सों में होली अलग-अलग तरीके से मनाई जाती हैं लेकिन मोक्ष की नगरी काशी की होली अन्य जगहों से अलग बिलकुल अद्भुत, अकल्पनीय व बेमिसाल हैं. आपने रंगों से होली तो खूब खेली होगी, लेकिन महादेव की नगरी काशी की बात ही निराली हैं. वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर शिव भक्त महाश्मशान में जलने वाले इंसानों के राख से तैयार भस्म से होली खेलते हैं.

दरअसल, फाल्गुन की एकादशी को यहां बाबा विश्वनाथ की पालकी निकलती हैं और लोग उनके साथ रंगों का त्योहर मनाते हैं. ऐसी मान्यता हैं कि बाबा उस दिन पार्वती का गौना कराकर दरबार लौटते हैं. दूसरे दिन शंकर अपने औघड़ रुप में श्मशान घाट पर जलती चिताओं के बीच चिता-भस्म की होली खेलते हैं. डमरुओं की गूंज और हर-हर महादेव के जयकारे व अक्खड़, अल्हड़भांग, पान और ठंडाई के साथ एक-दूसरे को मणिकर्णिका घाट का भस्म लगाते हैं.

होलीयह अद्भुत दृश्य होता हैं. धारणा यह हैं कि भगवान भोलेनाथ तारक का मंत्र देकर सबकों को तारते हैं. लोगों की आस्था हैं कि मशाननाथ रंगभरी एकादशी के एक दिन बाद खुद भक्तों के साथ होली खेलते हैं. काशी में महादेव ने ना सिर्फ अपने पूरे कुनबे के साथ वास किया बल्कि हर उत्सवों में यहां के लोगों के साथ महादेव ने बराबर की हिस्सेदारी की. खासकर उनके द्वारा फाल्गुन में भक्तों संग खेली गयी होली की परंपरा आज भी जीवंत की जाती हैं

महादेव के नारों के बीच एक-दूसरे को भस्म लगाने की परंपरा

बल्कि काशी के लोगों द्वारा डमरुओं की गूंज और हर हर महादेव के नारों के बीच एक-दूसरे को भस्म लगाने की परंपरा हैं. पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, काशी के मणिकर्णिका घाट पर शिव ने मोक्ष प्रदान करने की प्रतिज्ञा ली थी. काशी दुनिया की एक मात्र ऐसी नगरी है जहां मनुष्य की मृत्यु को भी मंगल माना जाता हैं. मान्यता हैं कि रंगभरी एकादशी एकादशी के दिन माता पार्वती का गौना कराने बाद देवगण एवं भक्तों के साथ बाबा होली खेलते हैं.

लेकिन भूत-प्रेत, पिशाच आदि जीव-जंतु उनके साथ नहीं खेल पाते हैं. इसीलिए अगले दिन बाबा मणिकर्णिका तीर्थ पर स्नान करने आते हैं और अपने गणों के साथ चिता भस्म से होली खेलते हैं. नेग में काशीवासियों को होली और हुड़दंग की अनुमति दे जाते हैं. भावों से ही प्रसन्न हो जाने वाले औघड़दानी की इस लीला को हर साल पूरी की जाती हैं . अबीर गुलाल से भी चटख चिता भस्म की फाग के बीच गूंजते भजन माहौल में एक अलग ही छटा बिखेरती हैं. जिससे इस घड़ी मौजूद हर प्राणी भगवान शिव के रंग में रंग जाता हैं| खबर आजतक

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